महालक्ष्मी (ज्येष्ठा-कनिष्ठा गौरी) उत्सव, अक्षय सुख-समृद्धि और संतान सुख की कामना में महिलाएं रखेंगी व्रत

इन्दौर, 18 सितंबर 2026: गणेशोत्सव के पावन माहौल के बीच आज से तीन दिवसीय महालक्ष्मी (ज्येष्ठा-कनिष्ठा गौरी) पूजन उत्सव का श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ शुभारंभ हो रहा है। सुख, समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए मनाया जाने वाला यह पवित्र उत्सव इस वर्ष 17 सितंबर से शुरू होकर 19 सितंबर 2026 तक चलेगा। इन तीन दिनों में माता गौरी के आगमन (आवाहन), मुख्य पूजन और विसर्जन की सनातन परंपराएं पूरी की जाएंगी।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महालक्ष्मी (ज्येष्ठा-कनिष्ठा गौरी) इस उत्सव के दौरान तीन दिनों के लिए मायके आती हैं। इस पावन अवसर पर घरों को विशेष रूप से सजाया जाता है और माता के स्वागत के लिए आकर्षक रंगोलियां बनाई जाती हैं। इन्दौर के केट चौराहा स्थित सहकार नगर एक्स. में होळकर परिवार द्वारा इस उत्सव को बेहद भव्य और पारंपरिक रूप से मनाया जा रहा है।

तीन दिवसीय उत्सव की तिथियां और शुभ मुहूर्त:

17 सितंबर (गुरुवार) – माता गौरी का आवाहन (आगमन): उत्सव के पहले दिन आज माता गौरी का घरों में पारंपरिक रूप से स्वागत किया जाएगा। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, आज शाम 7:52 बजे से पहले माता का आवाहन और स्थापना करना अत्यंत शुभ फलदायी है। महिलाएं पारंपरिक गीतों और ढोल-नगाड़ों के साथ माता के चरण-चिह्न बनाकर उन्हें घर के भीतर लाएँगी।

18 सितंबर (शुक्रवार) – ज्येष्ठ गौरी पूजन (मुख्य पूजा): उत्सव का दूसरा दिन मुख्य पूजन का होगा। इस दिन सुहागिन महिलाएं अखंड सौभाग्य और परिवार की समृद्धि के लिए माता महालक्ष्मी का विशेष श्रृंगार करेंगी। दोपहर के समय माता को विशेष महापूजा के साथ पूरण पोली और 16 प्रकार के व्यंजनों का महाभोग एवं 56 भोग लगेगा। (नैवेद्य) अर्पित किया जाएगा। शाम को हल्दी-कुंकुम का आयोजन होगा जिसमें महिलाएं एक-दूसरे को सौभाग्य द्रव्य भेंट करेंगी।

19 सितंबर (शनिवार) – ज्येष्ठ गौरी विसर्जन (विदाई): उत्सव के अंतिम दिन माता गौरी को भावभीनी विदाई दी जाएगी। शनिवार सुबह 7:00 बजे से दोपहर 3:15 बजे के बीच विसर्जन का शुभ समय रहेगा। माता को दही-भात या विशेष पकवानों का भोग लगाकर सुख-समृद्धि की प्रार्थना के साथ विसर्जित किया जाएगा।

श्रद्धा और परंपरा का अनूठा संगम: महालक्ष्मी (ज्येष्ठा-कनिष्ठा गौरी) पूजन का यह पर्व विशेष रूप से महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। उत्सव के दौरान माता गौरी को सोने-चांदी के आभूषणों, पारंपरिक साड़ियों और सोलह श्रृंगार से सजाया जाता है। तीन दिनों तक चलने वाले इस उत्सव से पूरे क्षेत्र का वातावरण भक्तिमय और सकारात्मक ऊर्जा से सराबोर रहता है।

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